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"ग्राम चेतना का घोष”नवीन सिंह राणा की कलम से

“ग्राम चेतना का घोष” नवीन सिंह राणा की कलम से  आओ कुछ नया करें, कुछ अपना और कुछ सबका भला करें। पुरानी बेड़ियों को तोड़कर, ऊंचे आसमान की ओर उड़ान भरें। ये हमारे गांव हमारी शान हैं, ये हमारे गांव मोतियों की खान हैं, ये हमारे गांव हर युवा के अरमान हैं, ये हमारे गांव हमारे अभिमान हैं। हम इन खेतों से सोना भी उगा सकतें हैं, हम इन बागों में हीरों की फसल लगा सकते हैं, हम चांदी और पन्ना के बीज उगा सकते हैं, हम अपने इन गांवों में हर किसी के मुस्कान ला सकते हैं। घाघरा पुकारती है, प्रकृति पुचकारती है, अब मौन न हो, निहार सौंदर्यता, तेरी सफलता तुझे भी पुकारती है। बीत गए वो दिन, अब नया सवेरा है, ये गांव बर्दिया, फकीर पुर तेरा और मेरा है, इनकी हर गली, राह में फूल लगा दें , आस पास के गांवों कोभी इससे महका दें, तब निश्चित ही कुछ "नवीन " काया कल्प होगा, वो दिन सचमुच अचरज होगा, सबको अचरज होगा। नवीन सिंह राणा द्वारा रचित कविता 

संस्मरण: **नई सुबह की ओर**

संस्मरण: **नई सुबह की ओर** नवीन सिंह राणा की कलम से  मैं सूरज कुमार चौधरी,  थारू समाज का एक साधारण सदस्य हूँ। मेरा जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ, जिसका नाम है बर्दिया गांव,जहाँ परंपरा और संस्कृति की जड़ें गहरी थीं, लेकिन जागरूकता और शिक्षा का अभाव भी था। लोग आर्थिक रूप से मजबूत नहीं थे।मेरे माता-पिता किसान थे और उनका सपना था कि मैं कुछ बड़ा करूँ और समाज की उन्नति में योगदान दूँ। मैंने उनके सपने को अपना सपना बनाया और कड़ी मेहनत से पढ़ाई की। शिक्षा के प्रति मेरा उत्साह और समर्पण मुझे शहर ले आया, जहाँ मैंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और सरकारी नौकरी हासिल की। लेकिन मेरे मन में हमेशा यह बात रही कि मेरे समाज के मेरे गांव के अधिकांश लोग अभी भी जागरूकता की कमी के कारण पीछे रह गए हैं। यह सोचकर मैंने तय किया कि मुझे अपने समाज के लिए कुछ करना होगा। गाँव लौटते ही मैंने देखा कि लोग अपनी जमीन के विवादों में उलझे हुए हैं और बच्चों की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मैंने अपने मित्र पवन और बहन राधा के साथ मिलकर एक जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया।और मिलकर कार्य आरंभ किया। हमने सबसे पहले ...