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जनवरी 18, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भुइंया पूजन: विवाह संस्कार में भू-देवी, जल-देव और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था का जीवंत प्रतीक

भुइंया पूजन: विवाह संस्कार में भू-देवी, जल-देव और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था का जीवंत प्रतीक नवीन सिंह राणा द्वारा संग्रहित और पब्लिश किया गया  राणा थारू समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का बंधन नहीं, बल्कि प्रकृति, परंपरा और पूर्वजों की चेतना से जुड़ा एक पवित्र संस्कार है। इस संस्कार की आत्मा में भुइंया पूजन बसता है—जो भूमि, जल और ग्राम देवताओं के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का भावपूर्ण उद्घोष है। विवाह के प्रथम दिवस चूल्हा बैठाने की परंपरा निभाई जाती है। दूसरे दिवस कठसई की रस्म के माध्यम से समाज अपने मूल संस्कारों को स्मरण करता है। इन्हीं के पश्चात संध्या समय में भुइंया पूजन सम्पन्न होता है—एक ऐसा अनुष्ठान जो मनुष्य और प्रकृति के मधुर संबंध को पवित्र गीतों, दीपों और आस्था से सींच देता है। भुइंया पूजन के अवसर पर ग्राम देवता की विधिवत पूजा की जाती है। कच-कच बरे, सीओ, गुलगुले, पुड़ी, लौंग जैसी पारंपरिक सामग्री प्रसाद रूप में अर्पित की जाती है। यह पूजा प्रायः गांव के भूमिसेन स्थल पर होती है, जहां नव देवियों की आराधना बड़े ही श्रद्धा-भाव से की जाती है। इसके पश्चात जल-देव की पूजा होती ...

कठसइ: प्रकृति, परंपरा और जीवन-संस्कार का पवित्र संगम।

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कठसइ: प्रकृति, परंपरा और जीवन-संस्कार का पवित्र संगम नवीन सिंह राणा द्वारा संग्रहित  थारू जनजातीय समाज की आत्मा उसकी परंपराओं में बसती है—ऐसी परंपराएँ जो केवल रीति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से बहती हुई जीवन-दृष्टि हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत पावन और अर्थपूर्ण संस्कार है “कठसइ”, जो हमारे पूर्वजों से प्राप्त अमूल्य विरासत है। यह संस्कार विवाह के पवित्र अवसर पर, भूमसेन पूजा के दिन आहूत किया जाता है—जब मन, घर और प्रकृति, तीनों एक साथ मंगल कामना में जुड़ जाते हैं। कठसइ के दिन थारू समाज अपने ईष्ट देवों को स्मरण करता है, उन्हें नमन करता है और प्रकृति के साथ अपने अटूट रिश्ते को फिर से जीवंत करता है। मूलतः थारू समाज हिंदू रिवाजों का द्योतक होने के साथ-साथ प्रकृति का उपासक है—वृक्ष, जल, अग्नि और धरती उसके आराध्य हैं। यही कारण है कि यहां हर संस्कार में प्रकृति केवल साक्षी नहीं, बल्कि सहभागी होती है। थारू समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का बंधन नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो कुलों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का संस्कार है। विवाह के पहले दिन जब चूल्हा बैठने की परंपरा निभाई जाती है, तब उसके अगले द...

एक विमर्श: हमारे संविधानिक अधिकारो की सुरक्षा क्यों?

एक विमर्श: हमारे संविधानिक अधिकारो की सुरक्षा क्यों ? (माघी महोत्सव 2026 जो बर्दिया गांव के खेल मैदान में आयोजित किया गया था उस कार्यक्रम में संपूर्ण भारत के समस्त थारू संगठनों  के पदाधिकारियों को आमंत्रित किया गया था उस दौरान विभिन्न  द्वारा दिए गए विचारों पर आधारित लेख आप सभी के सम्मुख प्रस्तुत किया जा रहा है।) 🖊️नवीन सिंह राणा  साथियों lनीचे प्रस्तुत लेख किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि एक पूरे वर्ग की मानसिकता पर संवाद है। यह लेख आरोप नहीं करता, बल्कि आत्मबोध जगाता है—ताकि जो लोग जनजाति कोटे से सरकारी सेवा में पहुँचे हैं, वे यह समझ सकें कि अधिकार केवल पाने की वस्तु नहीं, निभाने की जिम्मेदारी भी हैं।         जब अधिकार मिल जाएँ और जिम्मेदारी छूट जाए — एक खामोश संकट आज हमारे समाज में एक ऐसा वर्ग तेजी से बढ़ रहा है, जो पढ़लिख कर जनजाति कोटा के सहारे सरकारी सेवा में तो पहुँच गया है, पर अब उसी व्यवस्था को बचाने के प्रश्न पर मौन साधे हुए है। न उसके पास समय है, न ऊर्जा, न ही थोड़ा-सा धन। वह स्वयं को “सेटल” मान चुका है और समाज को “बीता हुआ अध्याय”। यही मौन आ...

Declaration of Village Consciousness”

Declaration of Village Consciousness” From the pen of Naveen Singh Rana Come do something new, Do some good for yourself and some good for everyone. Breaking the old shackles, Fly high to the skies. These villages are our pride. Our villages are mines of pearls. These are the desires of every youth of our village. These villages are our pride. We can also grow gold from these fields. We can grow diamonds in these gardens, We can grow seeds of silver and emerald, We can bring smiles to everyone in these villages of ours. The Ghaghra calls out, Nature beckons, Don't be silent now, behold the beauty, Your success calls out to you too. Those days are over, now is a new dawn. This village Bardiya, Fakirpur is mine, Plant flowers in every street and path. Enlighten the surrounding villages, Then there will definitely be some transformation. That day will be truly amazing. Everyone will be surprised. Poem written by Naveen Singh Rana

प्रेरणादायक कहानी का शीर्षक : “आरक्षण की चुप्पी”

प्रेरणादायक कहानी का शीर्षक : “आरक्षण की चुप्पी” 🖊️नवीन सिंह राणा  (आप सभी के के लिए भावनात्मक और गहराई से प्रेरित करने वाली कहानी प्रस्तुत है, जो विशेष रूप से उन लोगों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करेगी जिन्होंने जनजाति कोटा के तहत सरकारी नौकरी तो पा ली, पर अब उसी अधिकार, समाज और भविष्य की रक्षा के लिए समय, श्रम या धन देने से कतराते हैं) घना साल का जंगल था। सूरज की किरणें पत्तों से छनकर धरती पर ऐसे गिर रही थीं जैसे कोई इतिहास धीरे-धीरे अपनी कहानी लिख रहा हो। पास में नदी की कलकल मन को हर लेती थी।उसी जंगल की गोद में बसा था छोटा-सा गाँव — विशनपुर। यह गाँव कभी अपनी एकता, संघर्ष और स्वाभिमान के लिए जाना जाता था। इसी गाँव में पैदा हुआ था जगदेव कुमार, लोग उसे जग्गू या जगुआ कहकर बुलाते। उस के पिता जंगल से लकड़ी लाते थे, माँ खेतों में मजदूरी करती थी। घर मिट्टी का था, पर सपने फौलाद के। गाँव के बुज़ुर्ग अक्सर कहते थे— “बेटा, ये जो पढ़ाई का रास्ता है ना, ये तलवार से भी ज्यादा ताकतवर है।” जगुआ ने वही रास्ता चुना। संघर्ष का दौर नंगे पाँव स्कूल जाना, कच्चा रास्ता। एक किताब पाँच बच्चों में बाँटना,...

"ग्राम चेतना का घोष”नवीन सिंह राणा की कलम से

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“ ग्राम चेतना का घोष” नवीन सिंह राणा की कलम से  आओ कुछ नया करें, कुछ अपना और कुछ सबका भला करें। पुरानी बेड़ियों को तोड़कर, ऊंचे आसमान की ओर उड़ान भरें। ये हमारे गांव हमारी शान हैं, ये हमारे गांव मोतियों की खान हैं, ये हमारे गांव हर युवा के अरमान हैं, ये हमारे गांव हमारे अभिमान हैं। हम इन खेतों से सोना भी उगा सकतें हैं, हम इन बागों में हीरों की फसल लगा सकते हैं, हम चांदी और पन्ना के बीज उगा सकते हैं, हम अपने इन गांवों में हर किसी के मुस्कान ला सकते हैं। घाघरा पुकारती है, प्रकृति पुचकारती है, अब मौन न हो, निहार सौंदर्यता, तेरी सफलता तुझे भी पुकारती है। बीत गए वो दिन, अब नया सवेरा है, ये गांव बर्दिया, फकीर पुर तेरा और मेरा है, इनकी हर गली, राह में फूल लगा दें , आस पास के गांवों कोभी इससे महका दें, तब निश्चित ही कुछ "नवीन " काया कल्प होगा, वो दिन सचमुच अचरज होगा, सबको अचरज होगा। नवीन सिंह राणा द्वारा रचित कविता  (बहराइच के थारू समाज के गांव वासियों और नव चेतना के उदघोषकों को समर्पित)

संस्मरण: **नई सुबह की ओर**

संस्मरण: **नई सुबह की ओर** नवीन सिंह राणा की कलम से  मैं सूरज कुमार चौधरी,  थारू समाज का एक साधारण सदस्य हूँ। मेरा जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ, जिसका नाम है बर्दिया गांव,जहाँ परंपरा और संस्कृति की जड़ें गहरी थीं, लेकिन जागरूकता और शिक्षा का अभाव भी था। लोग आर्थिक रूप से मजबूत नहीं थे।मेरे माता-पिता किसान थे और उनका सपना था कि मैं कुछ बड़ा करूँ और समाज की उन्नति में योगदान दूँ। मैंने उनके सपने को अपना सपना बनाया और कड़ी मेहनत से पढ़ाई की। शिक्षा के प्रति मेरा उत्साह और समर्पण मुझे शहर ले आया, जहाँ मैंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और सरकारी नौकरी हासिल की। लेकिन मेरे मन में हमेशा यह बात रही कि मेरे समाज के मेरे गांव के अधिकांश लोग अभी भी जागरूकता की कमी के कारण पीछे रह गए हैं। यह सोचकर मैंने तय किया कि मुझे अपने समाज के लिए कुछ करना होगा। गाँव लौटते ही मैंने देखा कि लोग अपनी जमीन के विवादों में उलझे हुए हैं और बच्चों की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मैंने अपने मित्र पवन और बहन राधा के साथ मिलकर एक जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया।और मिलकर कार्य आरंभ किया। हमने सबसे पहले ...

“संस्कृति, स्वाभिमान और बलिदान का उत्सव: महाराणा प्रताप जयंती,

संस्कृति, स्वाभिमान और बलिदान का उत्सव की झलक और जीवन गाथा : महाराणा प्रताप जयंती  नवीन सिंह राणा की कलम से  (9मई 2025को राणा थारू समाज के स्वाभिमान स्थल थारू विकास भवन में राणा थारू परिषद की अगुवाई में आयोजित कार्यक्रम में प्रतिभागिता, अवलोकन व ऐतिहासिक पुस्तकों के आधार पर वर्णन)  9मई 2025को राणा थारू समाज के स्वाभिमान स्थल थारू विकास भवन के विशाल सभागार में महाराणा प्रताप सिंह जी की जयंती का आयोजन बहुत ही हर्षोल्लास के साथ किया गया। कार्यक्रम का शुभ आरंभ महाराणा प्रताप सिंह जी की प्रतिमा में मुख्य अतिथि के द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया, उसके बाद वंदना गीत,स्वागत गीत और अतिथियों का बैच अलंकरण कर अभिनंदन किया गया। महाराणा प्रताप सिंह जी के बारे में संक्षेप में जानकारी  जैसा कि हमारे देश भारत वर्ष की हर संतान जानती है कि महाराणा प्रताप मेवाड़ (वर्तमान राजस्थान) के सिसोदिया वंश के एक महान शासक थे, जो अपनी वीरता, स्वाभिमान और मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार न करने के लिए जाने जाते हैं और सम्पूर्ण विश्व में विख्यात हैं।उनका जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ में हुआ, और 157...