एक विमर्श: हमारे संविधानिक अधिकारो की सुरक्षा क्यों?


एक विमर्श: हमारे संविधानिक अधिकारो की सुरक्षा क्यों ?
(माघी महोत्सव 2026 जो बर्दिया गांव के खेल मैदान में आयोजित किया गया था उस कार्यक्रम में संपूर्ण भारत के समस्त थारू संगठनों  के पदाधिकारियों को आमंत्रित किया गया था उस दौरान विभिन्न  द्वारा दिए गए विचारों पर आधारित लेख आप सभी के सम्मुख प्रस्तुत किया जा रहा है।)
🖊️नवीन सिंह राणा 

साथियों lनीचे प्रस्तुत लेख किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि एक पूरे वर्ग की मानसिकता पर संवाद है। यह लेख आरोप नहीं करता, बल्कि आत्मबोध जगाता है—ताकि जो लोग जनजाति कोटे से सरकारी सेवा में पहुँचे हैं, वे यह समझ सकें कि अधिकार केवल पाने की वस्तु नहीं, निभाने की जिम्मेदारी भी हैं।
       जब अधिकार मिल जाएँ और जिम्मेदारी छूट जाए — एक खामोश संकट
आज हमारे समाज में एक ऐसा वर्ग तेजी से बढ़ रहा है, जो पढ़लिख कर जनजाति कोटा के सहारे सरकारी सेवा में तो पहुँच गया है, पर अब उसी व्यवस्था को बचाने के प्रश्न पर मौन साधे हुए है। न उसके पास समय है, न ऊर्जा, न ही थोड़ा-सा धन। वह स्वयं को “सेटल” मान चुका है और समाज को “बीता हुआ अध्याय”।
यही मौन आज सबसे बड़ा खतरा है। यह खतरा उनसे अधिक है जो अब तक कोटे का सहारे लिय बिना निष्क्रिय है।
अधिकार संघर्ष से जन्म लेते हैं, सुविधा से नहीं। और इस पर सभी को मनन भी करना चाहिए।
जनजातीय आरक्षण कोई दया नहीं है। यह किसी की कृपा नहीं और न ही किसी  की उदारता। यह सदियों के अन्याय, विस्थापन, शोषण और सांस्कृतिक अपमान के विरुद्ध चला संघर्ष है। जिन जंगलों में हमारे पुरखे रहते थे, जिन नदियों से उन्होंने जीवन पाया, उन्हीं से उन्हें बेदखल किया गया। शिक्षा, संसाधन और अवसर से वंचित रखकर फिर यह प्रश्न पूछा गया—“तुम पीछे क्यों रह गए?”क्या यह जायज था, शायद नहीं।
आरक्षण उस अन्याय की आंशिक भरपाई है—पूरा समाधान नहीं।
सरकारी नौकरी अंत नहीं, शुरुआत है, क्योंकि इससे उसे थोड़ा सहारा मिलता है आगे बढ़ने का, सोचने का, जीने का। वह दो कदम मिलाकर आगे चलने का प्रयास कर पाता है। वह अपना सर उठाकर चल पाता है।
जब कोई जनजातीय युवक या युवती सरकारी नौकरी में चयनित होता है, तो यह केवल उसका व्यक्तिगत उत्थान नहीं होता। वह पूरे समाज के लिए आशा का स्तंभ बनता है। गाँव की हर झोपड़ी यह सोचती है—“हमारा भी कोई है सिस्टम में।”
पर दुर्भाग्य तब शुरू होता है जब वही व्यक्ति कहता है—
“अब मेरी जिम्मेदारी खत्म।”
नौकरी अंत नहीं होती—वह समाज-सेवा की नई शुरुआत होती है। यह एक ऐसा मौका होता है कि हम अपने समाज के लिए भी कुछ कर पाएं, उनके विकास में भागीदार बन पाएं।
‘मेरे पास समय नहीं’ — यह वाक्य किसका बहाना है?
जिस व्यक्ति के पास ऑफिस के बाद सोशल मीडिया का समय है, शाम को घंटों उस पर समय बिता सकता है।
वीकेंड पर समारोहों का समय है, लोगों और परिवार के साथ पार्टी में जाना।
और व्यक्तिगत विकास के लिए समय है—कुछ ट्रेनिंग प्रोग्राम, सेल्फ अवेयरनेस, पुस्तक पढ़ना आदि जिससे अपना विकास हो।

लेकिन उसके पास समाज के लिए समय नहीं होना,
असल में इच्छा की कमी है, समय की नहीं।
समाज आपसे पूरा जीवन नहीं माँगता—
वह केवल आपकी उपस्थिति चाहता है।
‘मैंने बहुत मेहनत की है’ — हाँ, पर अकेले नहीं
यह सच है कि आपने मेहनत की है।
पर क्या वह मेहनत शून्य से शुरू हुई थी?
क्या वह संभव होती अगर
आरक्षण का प्रावधान न होता?
परीक्षा कक्ष में बराबरी का अवसर न मिलता?
संविधान आपके पीछे खड़ा न होता?
मेहनत व्यक्तिगत थी,
पर अवसर सामूहिक संघर्ष का परिणाम था।
सबसे बड़ा धोखा: लाभ लेकर अस्वीकार करना
आज कुछ लोग गर्व से कहते हैं—
“हमें आरक्षण की ज़रूरत नहीं थी।”
यदि ऐसा है, तो फिर उसे स्वीकार क्यों किया?
लाभ लेकर, संविधान द्वारा जो सुविधाएं मिली वह पढ़ाई में भी मिली।
और फिर उसी व्यवस्था को कमजोर पड़ते देखकर चुप रहना—
यह केवल नैतिक पतन नहीं,
यह भावी पीढ़ियों के साथ विश्वासघात है। जिन्हें भी वह अधिकार चाहिए जिसके सहारे आगे की राह आसान हुई।
आज नहीं बोले, तो कल बच्चे पूछेंगे, जो अधिकार कल तक हमें मिलता था आज क्यों नहीं मिल रहा। क्या जवाब दे पाओगे आप।
कल आपका बेटा या बेटी जब प्रमाणपत्र के लिए कार्यालय जाएगा,
जब उससे उसकी पहचान पर सवाल होंगे,
तब वह आपका लाडला या लाडली आपसे पूछेगा—
“पापा, जब हमारे अधिकार छीने जा रहे थे,
तब आप क्या कर रहे थे?”
उस दिन
कोई पद,
कोई वेतन,
कोई प्रतिष्ठा
इस प्रश्न से नहीं बचा पाएगी।
समाज को धन नहीं, दिशा चाहिए
समाज आपसे करोड़ों नहीं माँगता।
वह आपकी तनख्वाह नहीं चाहता।
वह चाहता है—
आपकी आवाज़
आपकी कलम
आपकी समझ
आपका मार्गदर्शन
अगर हर कोई 
महीने में एक दिन भी समाज के लिए दे दे—
तो कोई भी अधिकार संकट में नहीं पड़ेगा।
मौन भी एक पक्ष होता है
याद रखिए—
जब आप चुप रहते हैं,
तो आप तटस्थ नहीं रहते—
आप अन्याय के पक्ष में खड़े होते हैं।
इतिहास चिल्लाने वालों को नहीं,
मौन दर्शकों को कठघरे में खड़ा करता है।
अभी भी समय है
यह लेख देर से जागे लोगों के लिए नहीं,
बल्कि समय रहते जागने वालों के लिए है।
अधिकार तभी तक जीवित रहते हैं
जब तक लाभार्थी उन्हें अपना मानते हैं।
वरना वे केवल
संविधान की किताबों में
धूल खाते रह जाते हैं।
अंतिम शब्द
अगर आपने ऊंचाई जनजाति कोटा से पाया है—
तो अब उसे कायम रखना भी आपका कर्तव्य है।
क्योंकि—
जो समाज से लेकर समाज को कुछ नहीं लौटाता,
वह सुरक्षित तो हो सकता है,
पर सम्मानित नहीं।
और समाज अंततः
सम्मान को ही याद रखता है।
धन्यवाद 


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