संस्मरण: **नई सुबह की ओर**

संस्मरण: **नई सुबह की ओर**
नवीन सिंह राणा की कलम से 

मैं सूरज कुमार चौधरी,  थारू समाज का एक साधारण सदस्य हूँ। मेरा जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ, जिसका नाम है बर्दिया गांव,जहाँ परंपरा और संस्कृति की जड़ें गहरी थीं, लेकिन जागरूकता और शिक्षा का अभाव भी था। लोग आर्थिक रूप से मजबूत नहीं थे।मेरे माता-पिता किसान थे और उनका सपना था कि मैं कुछ बड़ा करूँ और समाज की उन्नति में योगदान दूँ। मैंने उनके सपने को अपना सपना बनाया और कड़ी मेहनत से पढ़ाई की।

शिक्षा के प्रति मेरा उत्साह और समर्पण मुझे शहर ले आया, जहाँ मैंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और सरकारी नौकरी हासिल की। लेकिन मेरे मन में हमेशा यह बात रही कि मेरे समाज के मेरे गांव के अधिकांश लोग अभी भी जागरूकता की कमी के कारण पीछे रह गए हैं। यह सोचकर मैंने तय किया कि मुझे अपने समाज के लिए कुछ करना होगा।

गाँव लौटते ही मैंने देखा कि लोग अपनी जमीन के विवादों में उलझे हुए हैं और बच्चों की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मैंने अपने मित्र पवन और बहन राधा के साथ मिलकर एक जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया।और मिलकर कार्य आरंभ किया।

हमने सबसे पहले शिक्षा पर ध्यान दिया। हमने गाँव में एक छोटा सा पुस्तकालय खोला और बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। साथ ही हमने एक छोटा सा बर्दिया एजुकेशनल एकेडमी खोली और आस पास के गांव के बच्चों को कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराई जो बाहर जाकर पढ़ाई नहीं कर पा रहे थे।हमने उन्हें यह भी समझाया कि उच्च शिक्षा ही उन्हें आत्मनिर्भर बना सकती है और समाज की प्रगति में उनका योगदान सुनिश्चित कर सकती है। धीरे-धीरे बच्चों और उनके माता-पिता में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी और कई बच्चों ने उच्च शिक्षा के लिए शहर का रुख किया।

इसके बाद हमने जमीन के मुद्दों पर काम किया। हमने कानूनी सलाहकारों से मिलकर गाँव के लोगों को उनकी जमीन के अधिकारों के बारे में बताया और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया। इससे गाँव के लोग अपनी जमीन को बचाने में सफल रहे और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ।

हमने रोजगार के नए अवसर पैदा करने के लिए भी कदम उठाए। हमने गाँव में सहकारी बैंक की स्थापना की जिससे लोग छोटे-मोटे व्यवसाय शुरू कर सके। छोटे छोटे स्व रोजगार के प्रशिक्षण की कार्ययोजना बनाकर महिलाओं और पुरुषों को काम सिखाया, उनसे हस्त शिल्प तैयार कराकर मार्केटिंग की व्यवस्था कराई।इससे गाँव में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ीं और लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई। जैविक खेती, पशु पालन, बागवानी, दुग्ध उत्पादन, ऑनलाइन कार्य, मत्स्य पालन, कुक्कुट पालन जैसे छोटे छोटे स्व रोजगार से युवाओं में आर्थिक विकास हुआ जिससे बर्दिया गांव ही नहीं उसके पास के अन्य गांवों में भी इसका प्रभाव हुआ।


संस्कृति और परंपरा को जीवंत रखने के लिए हमने विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया। इससे समाज के लोगों में अपनी जड़ों के प्रति गर्व और आत्मसम्मान की भावना बढ़ी। हमने यह भी सुनिश्चित किया कि हमारी युवा पीढ़ी नशामुक्त, स्वस्थ और मेहनती बने। इसके लिए हमने नशामुक्ति अभियान चलाया और स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया।

हमारे प्रयासों से गाँव में एक नई जागरूकता और उमंग की लहर दौड़ गई। लोग अब अपनी शिक्षा, जमीन और संस्कृति के प्रति अधिक सजग हो गए हैं। हमारे समाज के कई युवा अब सरकारी उच्च पदों पर आसीन हो चुके हैं और अपने समाज की उन्नति में योगदान दे रहे हैं।

यह संस्मरण मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि इसमें मैंने देखा कि एकजुटता, जागरूकता और मेहनत से कोई भी समाज अपनी समस्याओं का समाधान कर सकता है और उन्नति की राह पर चल सकता है। हमें बस एक दिशा और संकल्प की आवश्यकता है।

आज, जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो गर्व महसूस करता हूँ कि हमारे छोटे-छोटे प्रयासों ने हमारे समाज को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया है। यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है, बल्कि यह तो एक नई सुबह की शुरुआत है। हमें और आगे बढ़ना है, और अधिक मेहनत करनी है, ताकि हमारा  थारू समाज और हमारे गांव बर्दिया, फकीर पुर, बिशना पुर जैसे अन्य गांव भी हमेशा विकास की राह पर अग्रसर रहे।

काल्पनिक कहानी के माध्यम से जागरूकता और प्रेरणा हेतु नए युवाओं को समर्पित 
नवीन सिंह राणा की कलम से 
राणा संस्कृति मंजूषा की प्रस्तुति 

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