भुइंया पूजन: विवाह संस्कार में भू-देवी, जल-देव और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था का जीवंत प्रतीक
भुइंया पूजन: विवाह संस्कार में भू-देवी, जल-देव और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था का जीवंत प्रतीक
नवीन सिंह राणा द्वारा संग्रहित और पब्लिश किया गया
राणा थारू समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का बंधन नहीं, बल्कि प्रकृति, परंपरा और पूर्वजों की चेतना से जुड़ा एक पवित्र संस्कार है। इस संस्कार की आत्मा में भुइंया पूजन बसता है—जो भूमि, जल और ग्राम देवताओं के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का भावपूर्ण उद्घोष है।
विवाह के प्रथम दिवस चूल्हा बैठाने की परंपरा निभाई जाती है। दूसरे दिवस कठसई की रस्म के माध्यम से समाज अपने मूल संस्कारों को स्मरण करता है। इन्हीं के पश्चात संध्या समय में भुइंया पूजन सम्पन्न होता है—एक ऐसा अनुष्ठान जो मनुष्य और प्रकृति के मधुर संबंध को पवित्र गीतों, दीपों और आस्था से सींच देता है।
भुइंया पूजन के अवसर पर ग्राम देवता की विधिवत पूजा की जाती है। कच-कच बरे, सीओ, गुलगुले, पुड़ी, लौंग जैसी पारंपरिक सामग्री प्रसाद रूप में अर्पित की जाती है। यह पूजा प्रायः गांव के भूमिसेन स्थल पर होती है, जहां नव देवियों की आराधना बड़े ही श्रद्धा-भाव से की जाती है। इसके पश्चात जल-देव की पूजा होती है—गांव के किसी कुएं पर जाकर, क्योंकि जल केवल संसाधन नहीं, जीवन का देवत्व है।
कुछ परिवारों में यह परंपरा थोड़े भिन्न रूप में भी निभाई जाती है। वे भूमिसेन से पीपल की टहनी लाकर उसे घर के आंगन के कोने में स्थापित करते हैं, गोबर से लीपकर वहीं भूदेव की पूजा करते हैं। कुएं के स्थान पर घर के नल पर जल-पूजन कर लिया जाता है। रूप भले बदले हों, भाव वही रहता है—भूमि और जल के प्रति कृतज्ञता।
इस परंपरा की सबसे सुंदर बात इसकी मान्यता में छिपी है। थारू जनजाति मूलतः प्रकृति-पूजक है—वे मिट्टी को माता, जल को देवता और वृक्षों को जीवन-रक्षक मानते हैं। विवाह से पूर्व गाए जाने वाले श्रद्धा-गीत केवल मंगलकामना नहीं, बल्कि यह प्रार्थना हैं कि नव दंपति का जीवन प्रेम, उल्लास और सौहार्द से भरा रहे; उनका गृहस्थ जीवन प्रकृति के संतुलन की तरह स्थिर और मधुर बने।
भुइंया पूजन हमें सिखाता है कि आधुनिकता की दौड़ में भी अपनी जड़ों को न भूलें। यह परंपरा आज भी जीवित है—और जब तक भूमि से प्रेम, जल से सम्मान और प्रकृति से आत्मीयता बनी रहेगी, तब तक यह संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहेगा, युगों तक जीवित रहेगा।
टिप्पणियाँ