कठसइ: प्रकृति, परंपरा और जीवन-संस्कार का पवित्र संगम।
कठसइ: प्रकृति, परंपरा और जीवन-संस्कार का पवित्र संगम
नवीन सिंह राणा द्वारा संग्रहित
थारू जनजातीय समाज की आत्मा उसकी परंपराओं में बसती है—ऐसी परंपराएँ जो केवल रीति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से बहती हुई जीवन-दृष्टि हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत पावन और अर्थपूर्ण संस्कार है “कठसइ”, जो हमारे पूर्वजों से प्राप्त अमूल्य विरासत है। यह संस्कार विवाह के पवित्र अवसर पर, भूमसेन पूजा के दिन आहूत किया जाता है—जब मन, घर और प्रकृति, तीनों एक साथ मंगल कामना में जुड़ जाते हैं।
कठसइ के दिन थारू समाज अपने ईष्ट देवों को स्मरण करता है, उन्हें नमन करता है और प्रकृति के साथ अपने अटूट रिश्ते को फिर से जीवंत करता है। मूलतः थारू समाज हिंदू रिवाजों का द्योतक होने के साथ-साथ प्रकृति का उपासक है—वृक्ष, जल, अग्नि और धरती उसके आराध्य हैं। यही कारण है कि यहां हर संस्कार में प्रकृति केवल साक्षी नहीं, बल्कि सहभागी होती है।
थारू समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का बंधन नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो कुलों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का संस्कार है। विवाह के पहले दिन जब चूल्हा बैठने की परंपरा निभाई जाती है, तब उसके अगले दिन प्रातःकाल कठसइ संस्कार का शुभारंभ होता है। यह वह क्षण होता है जब भोर की ताज़ी हवा, पक्षियों की चहचहाहट और धरती की सौंधी गंध के बीच परंपरा जीवंत हो उठती है।
सुबह-सवेरे घर के बुजुर्ग या बड़े सदस्य गाँव के पांच-सात लड़कों या किशोरों को साथ लेकर गाँव के आम के बाग-बगीचों की ओर प्रस्थान करते हैं। उनके साथ होती है श्रद्धा से सजी एक धातु की थाली—जिसमें धूप, कच्चा धागा, कंडे की अग्नि, लौंग, घी और एक लोटा शुद्ध जल होता है। यह यात्रा केवल लकड़ी लाने की नहीं होती, यह प्रकृति से अनुमति लेने और उसका आशीर्वाद प्राप्त करने की यात्रा होती है।
बाग में पहुँचकर श्रद्धा अनुसार किसी एक आम के वृक्ष का चयन किया जाता है। उस वृक्ष से क्षमा और आशीर्वाद माँगा जाता है—मानो वह भी परिवार का एक बुजुर्ग हो। उसे जल अर्पित किया जाता है, गुड़ चढ़ाया जाता है और कच्चे धागे से उसके चारों ओर सात चक्कर लगाए जाते हैं। ये सात चक्कर जीवन के सात सूत्रों—सत्य, प्रेम, समर्पण, धैर्य, संतुलन, समृद्धि और संरक्षण—का प्रतीक बन जाते हैं।
इसके पश्चात सभी लड़के मिलकर आम की सूखी लकड़ियाँ एकत्र करते हैं। इस प्रक्रिया में कहीं भी वृक्ष को हानि नहीं पहुँचाई जाती—यह प्रकृति के प्रति थारू समाज की संवेदनशीलता और जिम्मेदारी को दर्शाता है। घर का मालिक उन बच्चों को गुड़ प्रसाद के रूप में देता है—मीठा प्रसाद, जो आने वाले जीवन की मिठास का प्रतीक होता है। फिर वे लकड़ियाँ सम्मान के साथ घर लाई जाती हैं और बच्चों को स्नेहपूर्वक भोजन कराया जाता है।
संध्या के समय, इन्हीं पवित्र लकड़ियों से भूमसेन की पूजा की जाती है। यदि घर में सत्यनारायण की पूजा या हवन होता है, तो उसमें भी इसी आम की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। अग्नि में समर्पित होती है श्रद्धा, विश्वास और मंगल कामना—वर और वधू के सुखमय, समृद्ध और संतुलित जीवन के लिए।
कठसइ केवल एक संस्कार नहीं, यह प्रकृति के साथ संवाद है, पूर्वजों की स्मृति है और भविष्य के लिए आशीर्वाद है। यह हमें सिखाता है कि समृद्धि केवल धन से नहीं, बल्कि संस्कारों, प्रकृति-प्रेम और सामूहिक चेतना से आती है।
सचमुच, राणा थारू समाज एक ऐसा समृद्ध समाज है जो प्रकृति पूजा से जुड़ी मान्यताओं को न केवल मानता है, बल्कि उन्हें जीता है। आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी परंपराओं को जीवंत रखकर, वह आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि जड़ें जितनी गहरी होंगी, भविष्य उतना ही सशक्त और सुंदर होगा।
नवीन सिंह राणा द्वारा थारू समाज से प्राप्त अनुभव के आधार पर
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