प्रेरणादायक कहानी का शीर्षक : “आरक्षण की चुप्पी”

प्रेरणादायक कहानी का शीर्षक : “आरक्षण की चुप्पी”
🖊️नवीन सिंह राणा 
(आप सभी के के लिए भावनात्मक और गहराई से प्रेरित करने वाली कहानी प्रस्तुत है, जो विशेष रूप से उन लोगों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करेगी जिन्होंने जनजाति कोटा के तहत सरकारी नौकरी तो पा ली, पर अब उसी अधिकार, समाज और भविष्य की रक्षा के लिए समय, श्रम या धन देने से कतराते हैं)

घना साल का जंगल था। सूरज की किरणें पत्तों से छनकर धरती पर ऐसे गिर रही थीं जैसे कोई इतिहास धीरे-धीरे अपनी कहानी लिख रहा हो। पास में नदी की कलकल मन को हर लेती थी।उसी जंगल की गोद में बसा था छोटा-सा गाँव — विशनपुर। यह गाँव कभी अपनी एकता, संघर्ष और स्वाभिमान के लिए जाना जाता था।
इसी गाँव में पैदा हुआ था जगदेव कुमार, लोग उसे जग्गू या जगुआ कहकर बुलाते।
उस के पिता जंगल से लकड़ी लाते थे, माँ खेतों में मजदूरी करती थी। घर मिट्टी का था, पर सपने फौलाद के।
गाँव के बुज़ुर्ग अक्सर कहते थे—
“बेटा, ये जो पढ़ाई का रास्ता है ना, ये तलवार से भी ज्यादा ताकतवर है।”
जगुआ ने वही रास्ता चुना।
संघर्ष का दौर
नंगे पाँव स्कूल जाना, कच्चा रास्ता।
एक किताब पाँच बच्चों में बाँटना,
दीये की लौ में पढ़ाई करना—
ये सब उसकी दिनचर्या थी।
जब वह पहली बार शहर गया प्रतियोगी परीक्षा देने, तो लोगों ने हँसते हुए कहा—
“अरे, ये तो आरक्षित है, इसे क्या मेहनत करनी।”
पर कोई नहीं जानता था कि उस “आरक्षण” के पीछे कितनी भूख, कितनी रातें और कितनी चुप चीखें थीं।
आख़िरकार, जगुआ का चयन हो गया।
सरकारी नौकरी।
गाँव में ढोल बजे, मिठाई बँटी, माँ की आँखों में पहली बार निश्चिंत नींद उतरी।
बदलता हुआ जगुआ,
समय बदला।
वह अब शहर के सरकारी क्वार्टर में रहने लगा।
मोबाइल बदल गया, कपड़े बदल गए, बोलचाल बदल गई।
गाँव से आए लोग जब उससे कहते—
“भैया, जनजाति अधिकारों पर हमला हो रहा है, संगठन को सहयोग चाहिए…”
तो वह मुस्कुराकर कह देता—
“अब मेरे पास टाइम नहीं है यार, ऑफिस का बहुत प्रेशर है।”
कभी कोई कहता—
“थोड़ा आर्थिक सहयोग…”
तो जवाब मिलता—
“मेरी भी जिम्मेदारियाँ हैं, बच्चों की पढ़ाई है।”
धीरे-धीरे, वह हर मंच से, हर संघर्ष से, हर आवाज़ से दूर होता चला गया।
एक दिन का झटका
एक दिन अख़बार की सुर्खी थी—
“जनजाति आरक्षण सूची में कटौती की तैयारी”
उसने ने अख़बार मोड़कर रख दिया।
“ये सब राजनीति है,” उसने खुद से कहा।
पर कुछ महीनों बाद उसके बेटे ने पूछा—
“पापा, हमारे कास्ट सर्टिफिकेट में इतनी जाँच क्यों हो रही है?”
फिर दफ्तर में चर्चा हुई—
“फ्यूचर में प्रमोशन में दिक्कत हो सकती है।”
अब उसके के भीतर डर जागा।
बुज़ुर्ग की आवाज़
वह गाँव लौटा।
वही बूढ़ा बरगद, वही मिट्टी की खुशबू।
बुज़ुर्ग धनुआ काका ने कहा—
“बेटा, जब नाव बन रही थी तब सबने लकड़ी दी।
अब नदी पार हो गई तो क्या नाव तोड़ देंगे?”
उसकी  आँखें झुक गईं।
काका बोले—
“आरक्षण कोई भीख नहीं, ये हमारे पुरखों के बलिदान की कमाई है।
अगर इसे बचाने के लिए आज पढ़ा-लिखा वर्ग आगे नहीं आएगा,
तो कल तुम्हारे बच्चों को ‘आरक्षित’ नहीं, ‘अवैध’ कहा जाएगा।”
अंतर्द्वंद्व और परिवर्तन
उस रात वह सो नहीं सका।
उसे अपनी माँ की झुकी कमर याद आई,
पिता के छाले पड़े हाथ याद आए,
और अपनी चुप्पी का बोझ महसूस हुआ।
अगले दिन उसने निर्णय लिया।
उसने समय दिया।
संगठन से जुड़ा।
कानूनी लड़ाई में सहयोग दिया।
युवाओं को मार्गदर्शन दिया।
लोगों ने पूछा—
“अब क्यों जागे?”
उसने ने कहा—
“क्योंकि अधिकार केवल लेने से नहीं,
बचाने से पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।”
अंतिम पंक्तियाँ
कहानी किसी एक जगदेव की नहीं,
यह हर उस व्यक्ति की है
जिसने जनजाति कोटे से ऊँचाई पाई
पर नीचे खड़े लोगों को भूल गया।
याद रखिए—
जो समाज से लेता है और समाज को लौटाता नहीं,
वह सिर्फ कर्मचारी होता है,
नेतृत्वकर्ता नहीं।
और जब अधिकार खतरे में हों,
तो चुप्पी भी अपराध बन जाती है।

🖊️नवीन सिंह राणा। 

(यह कहानी उन लोगों को समर्पित है जिनको तनिक भी कहानी हृदय में बदलाव ला पाती है।)

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