"ग्राम चेतना का घोष”नवीन सिंह राणा की कलम से

“ग्राम चेतना का घोष”
नवीन सिंह राणा की कलम से 

आओ कुछ नया करें,
कुछ अपना और कुछ सबका भला करें।
पुरानी बेड़ियों को तोड़कर,
ऊंचे आसमान की ओर उड़ान भरें।
ये हमारे गांव हमारी शान हैं,
ये हमारे गांव मोतियों की खान हैं,
ये हमारे गांव हर युवा के अरमान हैं,
ये हमारे गांव हमारे अभिमान हैं।
हम इन खेतों से सोना भी उगा सकतें हैं,
हम इन बागों में हीरों की फसल लगा सकते हैं,
हम चांदी और पन्ना के बीज उगा सकते हैं,
हम अपने इन गांवों में हर किसी के मुस्कान ला सकते हैं।
घाघरा पुकारती है,
प्रकृति पुचकारती है,
अब मौन न हो, निहार सौंदर्यता,
तेरी सफलता तुझे भी पुकारती है।
बीत गए वो दिन, अब नया सवेरा है,
ये गांव बर्दिया, फकीर पुर तेरा और मेरा है,
इनकी हर गली, राह में फूल लगा दें ,
आस पास के गांवों कोभी इससे महका दें,
तब निश्चित ही कुछ "नवीन " काया कल्प होगा,
वो दिन सचमुच अचरज होगा,
सबको अचरज होगा।
नवीन सिंह राणा द्वारा रचित कविता 

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