“बहराइच जनपद में थारू समुदाय: भौगोलिक ,सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान एवं शैक्षिक-आर्थिक यथार्थ का विश्लेषणात्मक अध्ययन”

बहराइच जनपद में थारू समुदाय: भौगोलिक ,सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान एवं शैक्षिक-आर्थिक यथार्थ का विश्लेषणात्मक अध्ययन”
🖊️ नवीन सिंह राणा 
खटीमा ऊधम सिंह नगर 

(बर्दिया गांव के खेल मैदान में आयोजित माघी महोत्सव 2026 के अवसर पर गांव भ्रमण, अवलोकन, समिति सदस्यों और गांव वासियों से संवाद से प्राप्त जानकारी के आधार पर विश्लेषण,)

बहराइच में थारू जनजाति के गाँव तराई क्षेत्र (उत्तरी भारत-नेपाल सीमा के पास) में हैं, जो घने जंगलों और शिवालिक पहाड़ियों के बीच स्थित हैं; इन गाँवों का भौगोलिक स्वरूप दिखाता है कि वे प्राकृतिक संसाधनों (जंगल) पर निर्भर हैं, जहाँ मिट्टी और जलवायु कृषि धान, मक्का, गन्ना, केला आदि के लिए अनुकूल है, और नदियाँ (जैसे सरयू/घाघरा) जीवनरेखा हैं, जबकि उनके घर ईंटों और मिट्टी के बने होते हैं, कहीं कहीं घर घास, खपरैल, आदि जो स्थानीय पर्यावरण के अनुरूप होते हैं,जिससे उनकी संस्कृति और प्रकृति के बीच गहरा संबंध दिखता है।

1. भौगोलिक स्थिति और पर्यावरण तराई क्षेत्र: बहराइच के थारू गाँव भारत-नेपाल सीमा से सटे तराई क्षेत्र में हैं, जो हिमालय की निचली तलहटी (शिवालिक) का हिस्सा है, जहाँ भरपूर नमी और उपजाऊ मिट्टी होती है।
  • जंगल: ये क्षेत्र और गांव घने जंगलों से घिरे हैं, जिससे यहां के थारू लोग वन-आधारित आजीविका (लकड़ी, वनोपज) अपनाते हैं और अपना जीवन यापन करते हैं। जलाने की लकड़ी, घर बनाने की लकड़ी की पूर्ति इन्हीं जंगलों से होती है।
  • नदी प्रणाली: बहराइच में नदियाँ (जैसे घाघरा) गाँवों के पास से गुजरती हैं, जो सिंचाई और जल आपूर्ति का स्रोत हैं, लेकिन बरसात में बाढ़ का खतरा भी रहता है। 
  • 2. बस्तियाँ और आवास मिट्टी और घास: उनके घर स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री, जैसे मिट्टी और घास (घास-फूस) से बने होते थे जो उन्हें मौसम से बचाते थे और पर्यावरण के अनुकूल होते थे । लेकिन वर्तमान में ईंटों के कच्चे पक्के मकान भी बनने लगे हैं।
  • गांवों का नाम: विशुनापुर, वर्दिया, फकीरपुर,आदि जैसे 13 गाँव थारू बहुल हैं, इन 13गांव से 9ग्राम सभाएं बनाई गई है ये खासकर मिहींपुरवा ब्लॉक में बसे है। जिनमें लगभग 15 हजार की जनसंख्या रहती है।
  • 3. कृषि और आजीविका :वन और कृषि: थारू मुख्य रूप से वनों पर आश्रित हैं, लेकिन कृषि गेहूं,धान, मक्का, गन्ना , केला आदि भी करते हैं, जो तराई की उपजाऊ मिट्टी के कारण संभव है।
  • पारंपरिक व्यवसाय: मछली पकड़ना, पशु पालन, मुर्गी, बतख और छोटे-मोटे व्यवसाय भी उनकी आजीविका का हिस्सा हैं, हालांकि पारंपरिक कलाएं लुप्त हो रही हैं। जिनके संरक्षण की आवश्यकता है। मोथ घास से विभिन्न प्रकार की हस्त शिल्प भी बनाए जाते हैं।
  • 4. सांस्कृतिक-भौगोलिक संबंध 
  • प्रकृति प्रेम: यहां के थारू जनजाति के लोग अपने प्रकृति प्रेम के लिए जाने जाते है, और उनका जीवनशैली, रीति-रिवाज सीधे तौर पर उनके भौगोलिक परिवेश से जुड़े हुए हैं।
  • आर्थिक विकास: होम स्टे योजनाएं इन गाँवों को पर्यटन से जोड़ रही हैं, जिससे उनकी संस्कृति और प्राकृतिक आवास को दर्शाया जा सके और स्थानीय लोगों को आर्थिक लाभ मिले। इस प्रकार यहां के थारू गाँव घने जंगलों और नदियों से घिरे एक विशिष्ट तराई पारिस्थितिकी तंत्र में स्थित हैं, जहाँ उनकी संस्कृति, आवास और आजीविका पूरी तरह से इस भौगोलिक परिवेश से जुड़े हैं।
     थारू जनजाति के गांवों का शैक्षिक और आर्थिक विश्लेषण :
शैक्षिक विश्लेषण
        यहां थारू समुदाय की शैक्षिक स्थिति में पिछले कुछ वर्षों में सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी कई चुनौतियां बरकरार हैं, जिस हेतु समाज के संगठनों , समाज के शिक्षित युवाओं को भी शिक्षा हेतु जागरूकता बढ़ाने के लिए सहयोग व प्रयास करने चाहिए।
साक्षरता दर: यहां रहने वाले थारू समाज में जागरूकता बढ़ने से साक्षरता में धीरे धीरे  सुधार तो हो रहा हैं। साथ ही स्नातक स्तर तक पहुँचने वालों की संख्या में कुछ सुधार हुआ  है  बच्चे उच्च शिक्षा हेतु गांवों से बाहर निकल कर अपने उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में प्रयासरत हैं।
युवाओं का रुझान: यहां थारू युवा अब आधुनिक शिक्षा और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। लेकिन संख्या उतनी नहीं है जितनी समाज को आज आवश्यकता है।वे पुलिस, सेना और शिक्षण जैसे क्षेत्रों में करियर बनाना पसंद करते हैं। और इन तेरह गांव में रहने वाले लगभग 15हजार की जनसंख्या में सरकारी रोजगार प्राप्त संख्या लगभग 100 है जो अति निम्न है। गांव के भीतर या पास में स्कूल और कंप्यूटर लैब स्थापित किए गए हैं, जिससे अब बच्चों को लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ती। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए  अभी और प्रयासों की जरूरत है।
आर्थिक विश्लेषण
थारू समुदाय की अर्थव्यवस्था पारंपरिक रूप से कृषि और वन उत्पादों पर आधारित रही है, लेकिन अब इसमें विविधीकरण देखा जा रहा है: 
आय का स्तर: आर्थिक रूप से यह समुदाय अभी भी निम्न स्तर पर है।  थारू परिवारों की वार्षिक आय निम्न जीवन स्तर जैसी है। जिस हेतु शिक्षा से ही सुधार संभव हो सकता है जो लोग सरकारी रोजगार या व्यवसायिक रूप से मजबूत हुए हैं उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।
मुख्य व्यवसाय:
कृषि: यह अभी भी आजीविका का मुख्य साधन है। सरकार की मदद से अब वे पारंपरिक खेती के बजाय आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों को अपना रहे हैं। जिससे अब धीरे धीरे सुधार हो रहा है।
पशुपालन और हस्तशिल्प: महिलाएं सिलाई-कढ़ाई और बांस व मुंज , मोथ से बनी वस्तुओं को बेचकर आय अर्जित कर रही हैं। जिससे उनकी आय में सुधार हुआ है।
रोजगार के स्थानीय अवसरों की कमी के कारण थारू युवाओं का शहरों की ओर पलायन बढ़ा है।लेकिन कई थारू गांवों को 'होम स्टे योजना' से जोड़कर पर्यटन के माध्यम से रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। 
शिक्षित थारू युवा इन गांवों में कोचिंग सेंटर, एजुकेशनल एकेडमी जैसे संस्थान खोलकर कम कीमत पर बच्चों को गुणवत्ता शिक्षा मुहैया करा कर अपने  लिए साथ साथ नए युवाओं को रोजगार प्राप्ति हेतु प्रयास कर सकते हैं।

यहां के थारू गांवों में सरकारी योजनाओं  के माध्यम से बुनियादी ढांचे और स्वरोजगार में तेजी आई है। हालांकि, उच्च शिक्षा के निम्न स्तर और प्रति व्यक्ति कम आय को सुधारने के लिए अभी और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। प्रकृति और खेतों की उपलब्धता को देखते हुए दुग्ध उत्पादन की भी अपार संभावना प्रतीत होती हैं । साथ ही, जैविक खेती,मत्स्य पालन, कुक्कुट पालन , मधु उत्पादन जैसी भी कई संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं।
इन तराई क्षेत्रों (जैसे फकीरपुर और बर्दिया गांव) में निवास करने वाली थारू जनजाति की संस्कृति प्रकृति, सामूहिकता और प्राचीन परंपराओं का एक अनूठा संगम है।  सांस्कृतिक विश्लेषण के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं: 
1. सामाजिक संरचना 
मातृसत्तात्मक समाज: थारू समाज पारंपरिक रूप से मातृसत्तात्मक रहा है, जहाँ परिवार के निर्णयों में महिलाओं की भूमिका प्रमुख होती है।
न्याय व्यवस्था: गांवों में आज भी पारंपरिक पंचायत  न्याय का प्राथमिक और विश्वसनीय माध्यम है।
2. धार्मिक विश्वास और त्यौहार 
प्रकृति पूजा: यह समुदाय प्रकृति के साथ गहरे सामंजस्य में रहता है। वे हिंदू धर्म के साथ-साथ प्रकृति का पालन करते हैं, जिसमें  गांव और घर की सुरक्षा के लिए 'भुइयां' (गांव के देवता) की पूजा की जाती है।
माघी महोत्सव, सावन में तीज, आषाढ़ में आषाढ़ी पूजा, और चैत्र में चराई  जैसे त्यौहार मनाए जाते हैं।
3. जीवनशैली और कला 
हस्तकला और नवाचार: बहराइच की थारू महिलाएं जूट और जलघास मोथ से डलिया, हैंडबैग और सजावटी सामान बनाने में निपुण हैं, जो अब एक प्रमुख आय का स्रोत बन गया है।
लोक नृत्य: यहां कई सांस्कृतिक नृत्य हैं, जो उत्सवों के दौरान सामूहिक रूप से किए जाते हैं।
पहनावा: पुरुष ऊंची धोती और फतुही पहनते हैं, जबकि महिलाएं रंगीन लहंगा-चोली पहनती हैं जिनमें कांच  जड़े होते हैं। जो दिखने में बहुत ही खूबसूरत लगते हैं।
4. खान-पान 
यहां थारू समुदाय के पारंपरिक भोजन में , शाकाहार के साथ साथ मछली,  मांस और जड़ी-बूटियों से बना पेय शामिल हैं। 
5. आधुनिक परिवर्तन 
 यहां थारू संस्कृति की तर्ज पर होम-स्टे विकसित किए जा रहे हैं ताकि पर्यटक उनकी पारंपरिक जीवनशैली का अनुभव कर सकें।
शिक्षा और रोजगार: सरकारी योजनाओं  के कारण युवा पीढ़ी अब शिक्षा और सेवा क्षेत्र की ओर बढ़ रही है। 
इस प्रकार यहां की थारू जनजाति ने आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों को सुरक्षित रखा है। जहाँ एक ओर वे अपनी पारंपरिक पंचायत और प्रकृति पूजा से जुड़े हैं, वहीं दूसरी ओर वे स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। 
धन्यवाद 
नवीन सिंह राणा की कलम से 
(बर्दिया गांव में  माघी महोत्सव दिनांक 9,10,11जनवरी 2026 के आयोजक सदस्यों को समर्पित)
नोट: उपरोक्त जानकारी जागरूकता समिति के सदस्य दिनेश कुमार मीडिया प्रभारी और श्री कीर्तन चौधरी ssb जी से वार्तालाप पर आधारित हैं, जिनमें कुछ अंतर हो सकता है। यदि आप इसमें और जानकारी में बदलाव या जुड़वाना चाहते हैं तो जानकारी कमेंट बॉक्स में डाल सकते है जिससे सुधार किया जा सके। आप हमें फ़ॉलो करें ताकि हमारी पोस्ट सबसे पहले आप तक पहुंच सके।


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