काव्य संवाद : "प्रेरणा की परछाईं में"
🌿 काव्य संवाद : "प्रेरणा की परछाईं में" ✍️ लेखनी: नवीन सिंह राणा के संवाद पर आधारित [निकेता:] कौन सा है ये अनुपम ऐप, जहाँ लेखों का होता माप? पढ़ा सभी ने, जान लिया, तेरे भावों का अनुपम ताप। [नवीन:] कोई ऐप नहीं, ये ब्लॉग है प्यारा, कितनों ने पढ़ा, बताता इशारा। तेरी कविता पर शब्द रचे हैं, मन के भावों को शब्दों में कसे हैं। [निकेता:] बहुत सुंदर लिखा है तुमने, अब तो कोई रोक न पाए। प्रकाशन की ओर बढ़ते क़दम, हर कोई बस वाह-वाह गाए। [नवीन:] प्रेरणा कहाँ से आती है, मैं भी नहीं जानता, पहले भी लिखा, पर खाली सा मानता। अब कुछ है जो भीतर से बोलता है, शब्दों को नए रंगों में खोलता है। [निकेता:] प्रेरणा तो है प्रकृति की गोद में, बच्चों की मुस्कान, खेत की ओस में। नदियाँ, जंगल, मिट्टी की बयार, ये सब बनते हैं कविता का आधार। [नवीन:] गीता कहती है जो न दुख से डरे, न सुख में डूबे, न पाने से फिरे। न भूत का भार, न भविष्य की चाह, क्या कहें ऐसे को, कहाँ से लाएं राह? [निकेता:] शायद समय ही उसका नाम है, या फिर वो... ! 😁 [नवीन:] हाहाहा! क्या खूब कही बात, थोड़ी सी हंसी भी है ज़रूरी साथ। वरना दर्शन की गहराई ...