आंगन की रोशनी एक मार्मिक कथा — सपनों, मोह, पश्चाताप और टूटते रिश्तों की

🎭 नाटिका: “आंगन की रोशनी” 🖊️नवीन सिंह राणा (एक मार्मिक कथा — सपनों, मोह, पश्चाताप और टूटते रिश्तों की) ✨ पात्र राघव – एक स्नेही, मेहनती पिता सीमा – ममता से भरी माँ आराध्या – उनकी इकलौती बेटी अंकित – बाहरी दुनिया का आकर्षण (मित्र) सूत्रधार – कथा को आगे बढ़ाने वाला दृश्य 1 : बचपन का आंगन (मंच पर एक छोटा-सा घर। कोने में तुलसी का चौरा। शाम का समय। सीमा आराध्या को गोद में लेकर लोरी गा रही है। राघव पास बैठा मुस्कुरा रहा है।) सूत्रधार: यह एक साधारण-सा घर था… पर सपने असाधारण थे। राघव की दुनिया उसकी बेटी आराध्या में बसती थी। वो कहते थे — “मेरी बिटिया इस घर की रोशनी बनेगी।” राघव (आराध्या को गोद में उठाते हुए): मेरी चिड़िया… तू पढ़-लिखकर बड़ी अफसर बनेगी। और हमेशा अपनी माँ-पापा का सम्मान करेगी, है ना? छोटी आराध्या (मासूम हँसी के साथ): हाँ पापा… मैं कभी आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी। सीमा (प्यार से): बस भगवान इसे खुश रखे। (तीनों हँसते हैं। रोशनी धीमी पड़ती है।) दृश्य 2 : सपनों की उड़ान सूत्रधार: समय बीता… गुड़िया बड़ी हो गई। पिता ने अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ त्याग दीं, ताकि बेटी की पढ़ाई में कोई कमी न रहे। राघव (थके स्वर में, पर चेहरे पर मुस्कान): सीमा, इस बार ओवरटाइम कर लिया है… आराध्या की कोचिंग की फीस भरनी है। सीमा: आप अपनी सेहत का भी ध्यान रखिए। राघव: मेरी सेहत? मेरी सेहत तो उसकी सफलता में है। (आराध्या चुपचाप सुन लेती है। उसकी आँखों में कृतज्ञता और कहीं एक दबाव भी।) दृश्य 3 : बाहरी दुनिया का आकर्षण सूत्रधार: कॉलेज की दुनिया… नई दोस्तियाँ… नए सपने… और चमकती हुई एक नई दुनिया। (अंकित प्रवेश करता है) अंकित: आराध्या, तुम बहुत टैलेंटेड हो। इस छोटे-से शहर में क्यों रहना? मुंबई चलो… अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीओ। आराध्या (दुविधा में): पर… मम्मी-पापा? उनके सपने? अंकित (हल्की हँसी): सपने तुम्हारे हैं या उनके? ज़िंदगी तुम्हारी है या उनकी? (आराध्या खिड़की से बाहर शहर की रोशनी देखती है। उसके चेहरे पर आकर्षण और अपराधबोध दोनों हैं।) दृश्य 4 : उधेड़बुन सूत्रधार: मन दो हिस्सों में बँट गया। एक ओर चमकती दुनिया… दूसरी ओर माँ की लोरी, पापा का लाड़। आराध्या (स्वगत): अगर मैं चली गई तो? अगर मैंने अपने सपनों को चुना तो? क्या मैं स्वार्थी कहलाऊँगी? (राघव दरवाज़े पर खड़े हैं।) राघव: बेटा, कुछ परेशान लग रही हो? आराध्या (आँखें छुपाते हुए): नहीं पापा… सब ठीक है। (सीमा मंदिर में दीप जला रही है।) सीमा: हे भगवान, मेरी बच्ची को सही रास्ता दिखाना। दृश्य 5 : वह निर्णय (मंच अंधेरा। हल्की नीली रोशनी। बारिश की आवाज़।) सूत्रधार (धीमे स्वर में): कभी-कभी मन की आँधी इतनी तेज़ होती है कि इंसान सही-गलत का भेद खो देता है। (आराध्या मेज़ पर एक पत्र लिखती है।) आराध्या (रोते हुए पढ़ती है): “मम्मी-पापा, मैं आपकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। मैं थक गई हूँ इस द्वंद्व से। मुझे माफ कर दीजिए…” (रोशनी अचानक बुझ जाती है। सन्नाटा।) दृश्य 6 : शोक सूत्रधार: वो बेटी… जो इस घर की रोशनी थी… अब केवल एक तस्वीर बन गई। सीमा (तस्वीर से लिपटकर): तूने एक बार कहा क्यों नहीं बेटा… हम तेरे साथ खड़े होते। राघव (टूटे स्वर में): मेरी चिड़िया… तूने उड़ना तो चाहा… पर हमें बिना बताए क्यों उड़ गई? (दोनों फूट-फूटकर रोते हैं।) अंतिम संदेश सूत्रधार मंच के केंद्र में आता है। आज की यह कहानी केवल एक घर की नहीं… यह उन हर माता-पिता की है जो अपने बच्चों में अपना भविष्य देखते हैं। और यह उन हर बच्चों की भी है जो सपनों और रिश्तों के बीच फँस जाते हैं। जीवन किसी भी निर्णय से बड़ा है। एक पल का आवेश… पूरी जिंदगी का अंधेरा बन सकता है। अगर दिल में उधेड़बुन हो — तो चुप मत रहिए। बात कीजिए। क्योंकि हर समस्या का समाधान है, पर जीवन का कोई दूसरा अवसर नहीं। 🌼 उपसंहार (मंच पर दीप जलता है।) सूत्रधार: हर बेटी घर की रोशनी है। उसे उड़ान दीजिए… पर उसके पंखों में विश्वास और संवाद का आकाश भी भरिए। (पर्दा गिरता है।) ।Published by Naveen Singh Rana

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