गोरखा नदी: एक लोककथा by Naveen Singh Rana

### गोरखा नदी: एक लोककथा
नवीन सिंह राणा की कलम से ( यह लोककथा लेखक ने बचपन में अपने दादाजी स्वर्गीय प्रेम सिंह राणा जी से सुनी थी जिनके खेतके पास में ही यह नदी बहती है और यह मंदिर निर्मित है,)

#### प्रारंभ

नोगवा नाथ गांव, जो अपनी प्राचीन संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है, इस गांव में कालू बर्दिया बाबा जी की कुछ पीढ़ियां निवास करती थी।वहां एक ऐसी नदी बहती है जिसे गोरखा नदी के नाम से जाना जाता है। इस नदी का उदगम स्थल नोगवा नाथ गांव से लगभग एक से डेढ़ किलोमीटर दूर जंगल के अंदर स्थित है, जहाँ से एक जलधारा धरती के गर्भ से निकलती है। यह जलधारा साल भर बहती रहती है और कभी सूखती नहीं है। इस गोरखा नदी के उदगम और उसके महत्व के पीछे एक भावुक और प्रेरणादायक लोककथा प्रचलित है।

#### गोरख नाथ बाबा का मंदिर

नोगवा नाथ गांव में एक अति प्राचीन मंदिर स्थित है, जो गोरख नाथ बाबा को समर्पित है। इस मंदिर की वास्तुकला अपने आप में अद्वितीय और प्राचीन है, जो हमारे पूर्वजों की कला और संस्कृति को दर्शाती है। इस मंदिर का गोरखा नदी से गहरा संबंध है, जिसे आज भी ग्रामीण अपनी आस्था का प्रतीक मानते हैं।

#### सूखा और संकट

बहुत समय पहले की बात है, जब उस इलाके में भीषण सूखा पड़ गया। तालाब, कुंए, और नाले सभी सूख गए और पीने के पानी की भारी किल्लत हो गई। गांव के लोग अपनी प्यास बुझाने के लिए तरस रहे थे और निराशा में जी रहे थे। तब सभी ग्रामीण गोरख नाथ बाबा के मंदिर में पहुंचे और बाबा जी से प्रार्थना की कि वे इस संकट से उन्हें उबारें।

#### बाबा जी की तपस्या

गोरख नाथ बाबा ने ग्रामीणों की व्यथा सुनी और उन्हें आश्वासन दिया कि वे इस समस्या का समाधान निकालेंगे। बाबा जी जंगल की ओर चले गए और वहां गहन तपस्या में लीन हो गए। कई दिनों की तपस्या के बाद, एक दिव्य ध्वनि ने बाबा जी को संदेश दिया कि जिस स्थान पर वे तपस्या कर रहे हैं, वहां से एक जलधारा प्रस्फुटित होगी जो युगों-युगों तक लोगों की जल की आवश्यकता पूरी करेगी।

#### दिव्य निर्देश

दिव्य ध्वनि ने बाबा जी को निर्देश दिया कि वे उस जलधारा का अनुसरण करें और वह जलधारा उनके पीछे-पीछे चलेगी। लेकिन एक चेतावनी दी गई कि बाबा जी भूल से भी पीछे मुड़कर न देखें, वरना नदी अपना रुख बदल लेगी। बाबा जी ने दिव्य निर्देश का पालन किया और जलधारा का अनुसरण करते हुए आगे-आगे चलने लगे।

#### भूल और परिणाम

जब बाबा जी अपने मंदिर के पास पहुंचने वाले थे, तो उनके मन में एक संदेह उत्पन्न हुआ कि क्या जलधारा उनके पीछे-पीछे आ रही है या नहीं। अपनी इस चिंता को दूर करने के लिए उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। जैसे ही उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, जलधारा ने अपना रुख बदल लिया और वहीं से दूसरी दिशा में मुड़ गई। जलधारा उत्तर की ओर से पूर्व होते हुए दक्षिण दिशा में चली गई।

#### वर्तमान प्रमाण

आज भी गोरखा नदी के इस विचित्र मोड़ के सजीव प्रमाण देखे जा सकते हैं। यह नदी आज भी गांव के लोगों की प्यास बुझाती है और उन्हें जल प्रदान करती है। गोरख नाथ बाबा की तपस्या और उनकी त्यागमयी भक्ति के कारण यह नदी आज भी हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है।

#### समापन

यह लोककथा हमारे पूर्वजों की महानता और हमारी संस्कृति, परंपराओं और मान्यताओं की धरोहर है। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति और तपस्या कभी व्यर्थ नहीं जाती और दिव्य शक्तियों का आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ होता है, बशर्ते हम अपने विश्वास और अनुशासन को बनाए रखें। धन्य हैं हमारे पूर्वज, जिन्होंने ऐसी प्रेरणादायक कहानियां हमें विरासत में दी हैं।

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